पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में वर्तमान एवं पूर्व सांसदों तथा विधायकों के विरुद्ध कुल 4,192 मामले विचारण हेतु लंबित हैं।
परिचय
- 28 में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के विरुद्ध आपराधिक मामले विचाराधीन हैं।

राजनीति के अपराधीकरण के कारण
- कमजोर अयोग्यता संबंधी कानून: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA) के अनुसार, उम्मीदवारों की अयोग्यता केवल दोषसिद्धि के बाद होती है। चूँकि मुकदमों के निपटारे में वर्षों लग जाते हैं, इसलिए उम्मीदवार किसी निर्णय के आने से पहले कई चुनाव लड़ लेते हैं।
- धन एवं बाहुबल का प्रभाव: वित्तीय संसाधनों और स्थानीय प्रभाव वाले उम्मीदवारों को अक्सर “विजयी होने की अधिक संभावना वाले” उम्मीदवार के रूप में देखा जाता है।
- मतदाता जागरूकता का अभाव: शपथ-पत्रों में उम्मीदवारों से संबंधित विवरण उपलब्ध कराए जाते हैं, लेकिन अनेक मतदाता इन जानकारियों से अनभिज्ञ रहते हैं या जाति/धर्म के आधार पर मतदान करते हैं।
- राजनीतिक दलों की मिलीभगत: राजनीतिक दल कभी-कभी उम्मीदवार की लोकप्रियता और चुनाव जीतने की संभावनाओं के आधार पर उसके आपराधिक मामलों को उचित ठहराते हुए उसकी उम्मीदवारी का समर्थन करते हैं।
- न्यायिक विलंब: बार-बार स्थगन तथा न्यायिक प्रक्रियाओं की लंबी अवधि के कारण आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति दोषसिद्धि से बच निकलते हैं।
राजनीति के अपराधीकरण का प्रभाव
- लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण: यह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के सिद्धांत को कमजोर करता है। मतदाताओं के सामने विकल्प सीमित हो जाते हैं, जिससे प्रतिनिधि लोकतंत्र की भावना कमजोर होती है।
- भ्रष्टाचार: आपराधिक तत्वों की उपस्थिति से चुनावी कदाचार में वृद्धि होती है, जैसे मतदाताओं को डराना-धमकाना, बूथ कैप्चरिंग तथा चुनाव प्रचार में काले धन का उपयोग।
- जनविश्वास में गिरावट: दागी छवि वाले प्रतिनिधियों के बार-बार निर्वाचित होने से मतदान प्रतिशत में कमी आती है और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति लोगों का विश्वास कमजोर होता है।
- नीति-निर्माण का विकृतिकरण: निर्वाचित प्रतिनिधि अपने व्यक्तिगत हितों तथा आपराधिक नेटवर्क की रक्षा के लिए राजनीतिक शक्ति का उपयोग कर सकते हैं, जिससे नीति-निर्माण जनहित से विमुख हो जाता है।
प्रमुख समितियों की सिफारिशें
- इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) एवं द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2007) ने काले धन के उपयोग पर अंकुश लगाने और भ्रष्टाचार को कम करने के लिए चुनावों के आंशिक राज्य-वित्तपोषण की सिफारिश की।
- संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग ने अपनी 2002 की रिपोर्ट में राजनीतिक दलों की जवाबदेही बढ़ाने के उपायों की सिफारिश की। इनमें दलों के चुनावी व्यय का वैधानिक लेखा-परीक्षण तथा उम्मीदवारों की परिसंपत्तियों और देनदारियों का खुलासा शामिल था।
- विधि आयोग की 244वीं रिपोर्ट (2014) ने सिफारिश की कि ऐसे अपराधों में, जिनमें अधिकतम पाँच वर्ष या उससे अधिक के कारावास का प्रावधान है, आरोप तय होते ही राजनेताओं को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
- रिपोर्ट में वर्तमान सांसदों और विधायकों से संबंधित मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट-ट्रैक न्यायालयों की स्थापना के माध्यम से सुनवाई में तीव्रता लाने की विशेष सिफारिश की गई।
सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप
- भारत संघ बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (2002): सर्वोच्च न्यायालय ने उस उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें निर्वाचन आयोग को चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से संबंधित पृष्ठभूमि की जानकारी प्राप्त कर उसे सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था।
- इस जानकारी में उम्मीदवारों की संपत्ति, आपराधिक रिकॉर्ड और शैक्षणिक योग्यता से संबंधित विवरण शामिल हैं।
- न्यायालय ने माना कि सार्वजनिक पद धारण करने वाले व्यक्तियों के बारे में जानने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से उत्पन्न होता है।
- लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013): न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी वर्तमान सांसद, विधायक या विधान परिषद सदस्य (MLC) को ऐसे अपराध में दोषसिद्धि होने पर, जिसमें दो वर्ष या उससे अधिक के कारावास की सजा हुई हो, तत्काल अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
- पब्लिक इंटरेस्ट फ़ाउंडेशन बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का निर्देश दिया, जिसमें अपराधों और आरोपों की प्रकृति का विवरण शामिल हो।
- रामबाबू सिंह ठाकुर बनाम सुनील अरोड़ा (2020): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे लंबित आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों का विवरण अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया और समाचार-पत्रों में प्रकाशित करें। साथ ही, उम्मीदवार के चयन के कारणों का भी उल्लेख किया जाए। यह जानकारी उम्मीदवार के चयन के 48 घंटे के अंदर प्रकाशित की जानी थी।
- त्वरित सुनवाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश:
- 2017 में, सर्वोच्च न्यायालय ने विधायकों से संबंधित आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए 10 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 12 विशेष न्यायालय स्थापित करने का आदेश दिया।
- 2018 में, न्यायालय ने प्रत्येक जिले में एक नामित सत्र न्यायालय और एक नामित मजिस्ट्रेट न्यायालय की पहचान करने का निर्देश दिया, ताकि ऐसे मामलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जा सके।
- 2023 में, सर्वोच्च न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को ऐसे मामलों के शीघ्र निपटारे की निगरानी के लिए स्वतः संज्ञान मामले दर्ज करने का निर्देश दिया तथा विशेष पीठों को त्वरित सुनवाई के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने का अधिकार दिया।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद, लंबित मामलों की संख्या लगभग उसी स्तर पर बनी रही।
130वाँ संविधान संशोधन विधेयक
- पृष्ठभूमि: यह विधेयक वर्ष 2025 में प्रस्तुत किया गया था और इसके बाद तीव्र विरोध एवं प्रदर्शन के बीच इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेज दिया गया।
- प्रमुख विशेषताएँ: विधेयक में ऐसे मंत्री को पद से हटाने का प्रावधान किया गया है, जिस पर पाँच वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध का आरोप हो तथा जिसे लगातार 30 दिनों तक गिरफ्तार कर हिरासत में रखा गया हो।
- यदि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहते हैं, तो उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना होगा; अन्यथा वे 31वें दिन स्वतः पद पर बने रहने का अधिकार खो देंगे।
- प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को हटाने का निर्देश क्रमशः राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को परामर्श दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, 30 दिनों की निरंतर हिरासत पूरी होने पर 31वें दिन पद स्वतः समाप्त हो जाएगा।
- वर्तमान में मंत्री त्यागपत्र देने, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री द्वारा पद से हटाए जाने अथवा वर्तमान कानूनों के अंतर्गत दोषसिद्धि के बाद अयोग्य घोषित होने के माध्यम से पद छोड़ते हैं।
निष्कर्ष
- निर्वाचित प्रतिनिधियों की आपराधिक पृष्ठभूमि लोकतांत्रिक शासन को कमजोर करती है, कानून के शासन को प्रभावित करती है तथा संस्थाओं के प्रति जनविश्वास को क्षीण करती है।
- इस समस्या के समाधान के लिए चुनावी सुधार, लंबित मामलों की त्वरित सुनवाई, राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता तथा मतदाताओं की सूचित एवं जागरूक भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है।
स्रोत: IE